21 अगस्त 2026 को दिल्ली के जंतर-मंतर पर एक बार फिर बड़ी भीड़ जुटी, जब आरक्षण हटाओ आंदोलन के तत्वावधान में हजारों प्रदर्शनकारी सड़कों पर उतरे। इस प्रदर्शन का प्रमुख चेहरा रहे पत्रकार और यूट्यूबर अजीत भारती जिन्होंने मंच से जोशीला भाषण देकर आंदोलन को नई ऊर्जा दी।
![]() |
| Ajeet Bharti |
आरक्षण हटाओ आंदोलन की शुरुवात
"आरक्षण हटाओ आंदोलन" मूल रूप से इंस्टाग्राम पर एक पेज के रूप में शुरू हुआ था जिसने कुछ ही हफ्तों में लाखों फॉलोअर्स जुटा लिए। यह आंदोलन खुद को किसी राजनीतिक दल से जुड़ा नहीं बताता और इसे एक नागरिक-नेतृत्व वाला दलगत राजनीति से स्वतंत्र अभियान बताया जाता है। आंदोलन जाति आधारित आरक्षण व्यवस्था को समाप्त कर उसकी जगह आर्थिक आधार पर अवसर देने की मांग करता है।
प्रदर्शन स्थल को लेकर जंतर मंतर पर विवाद
प्रदर्शन से एक दिन पहले, 20 अगस्त को दिल्ली पुलिस ने यह स्पष्ट किया था कि जंतर-मंतर पर किसी भी प्रदर्शन, जुलूस या सभा की अनुमति नहीं दी गई है। पुलिस के इस बयान के जवाब में अजीत भारती ने सार्वजनिक रूप से लोगों से अगले दिन जंतर-मंतर आने की अपील की और पुलिस को चुनौती दी कि अगर वे चाहें तो उनके खिलाफ कार्रवाई करें। इसके अगले दिन यानी 21 अगस्त को प्रदर्शन के दौरान दोपहर के आसपास आयोजकों को सूचित किया गया कि पुलिस ने जंतर-मंतर की बजाय रामलीला मैदान में मात्र 500 लोगों को शाम चार बजे तक प्रदर्शन की अनुमति दी है। अजीत भारती ने इस फैसले पर सवाल उठाते हुए पूछा कि आखिर 500 लोगों की सभा जंतर-मंतर पर क्यों नहीं हो सकती और इसके लिए उन्होंने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह तथा दिल्ली पुलिस की आलोचना की।
अजीत भारती का भाषण और मुख्य मांगें
मंच से बोलते हुए अजीत भारती ने आंदोलन को कमजोर करने के प्रयासों पर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि कुछ लोग आंदोलन का मनोबल तोड़ने उसे बदनाम करने और उसमें फूट डालने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन ऐसा होने नहीं दिया जाएगा। भीड़ को संबोधित करते हुए उन्होंने अगले दिन भी जंतर-मंतर लौटने का ऐलान किया।
मीडिया से बातचीत में अजीत भारती ने आंदोलन की चार प्रमुख मांगें सामने रखीं। पहली और सबसे बड़ी मांग यह थी कि सरकार एक श्वेत पत्र (White Paper) जारी करे जिसमें बताया जाए कि पिछले करीब अस्सी वर्षों में दिए गए आरक्षण का वास्तव में क्या नतीजा निकला है। उनका कहना था कि आरक्षण को बढ़ाने या घटाने पर बहस से पहले मौजूदा व्यवस्था के परिणामों को सार्वजनिक किया जाना चाहिए। दूसरी मांग "कोटे के भीतर कोटा" यानी उप-वर्गीकरण की थी जिसके तहत उन्होंने तर्क दिया कि आरक्षित वर्गों के भीतर भी सामाजिक और आर्थिक असमानता मौजूद है। तीसरी मांग आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) आरक्षण को संरक्षित रखने की थी जबकि चौथी मांग आरक्षित श्रेणी के उम्मीदवारों के लिए न्यूनतम अर्हता अंक तय किए जाने से जुड़ी थी।
निष्कर्ष
जंतर-मंतर पर हुआ यह प्रदर्शन आरक्षण व्यवस्था को लेकर देश में चल रही बहस को एक नया मोड़ देने वाला साबित हुआ। अजीत भारती और आयोजकों ने इसे आंदोलन की बड़ी सफलता के रूप में पेश किया वहीं दूसरी ओर आलोचकों का कहना है कि आरक्षण को खत्म करने से पहले जातिगत भेदभाव की मौजूदा वास्तविकताओं पर भी गंभीरता से विचार होना चाहिए। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह आंदोलन आगे किस दिशा में बढ़ता है और सरकार की ओर से इस पर क्या प्रतिक्रिया आती है।
