उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह से जुड़े 30 रोचक तथ्य

उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता कल्याण सिंह भारतीय राजनीति के उन चुनिंदा नेताओं में से थे जिन्होंने अपनी दृढ़ता, प्रशासनिक क्षमता और वैचारिक प्रतिबद्धता से एक अलग पहचान बनाई। वे भाजपा के हिंदी पट्टी के एवं कट्टर हिंदुत्व छवि वाले प्रभावशाली नेताओं में गिने जाते थे। आइए जानते हैं उनके जीवन और राजनीतिक सफर से जुड़े 30 रोचक तथ्य।

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Kalyan Singh 

उत्तरप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के बारे में 30 रोचक तथ्य 

  1. कल्याण सिंह का जन्म 5 जनवरी 1932 को उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले के अतरौली में एक किसान परिवार में हुआ था।

  2. उनके पिता का नाम तेजपाल सिंह लोधी और माता का नाम सीता देवी था।

  3. वे बचपन से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (Rss) से जुड़े रहे।

  4. उन्होंने D S डिग्री कॉलेज अलीगढ़ से शिक्षा प्राप्त की और B.A, L.T. की उपाधि हासिल की।

  5. राजनीति में आने से पहले वे एक शिक्षक के रूप में कार्यरत थे।

  6. 1952 में उनका विवाह रामवती देवी से हुआ जिनसे उन्हें एक पुत्र राजवीर सिंह और एक पुत्री प्रभा हुई। 

  7. उन्होंने 1967 में पहली बार भारतीय जनसंघ के टिकट पर अतरौली विधानसभा सीट से चुनाव जीता।

  8. आपातकाल (1975-77) के दौरान उन्हें भी करीब 21 महीनों तक जेल में रहना पड़ा था।

  9. अपने राजनीतिक करियर में उन्होंने कुल नौ बार विधानसभा चुनाव जीता।

  10. वे पहली बार 1977 में उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री बने।

  11. कल्याण सिंह 24 जून 1991 को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने और भाजपा के राज्य के पहले मुख्यमंत्री होने का गौरव हासिल किया।

  12. उनका पहला कार्यकाल 6 दिसंबर 1992 को समाप्त हो गया, जब बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद उनकी सरकार बर्खास्त कर दी गई।

  13. वर्ष 1994 में सर्वोच्च न्यायालय ने उन्हें मस्जिद की सुरक्षा सुनिश्चित न कर पाने और अदालत के आदेश का पालन न करने के मामले में अवमानना का दोषी पाते हुए एक दिन की प्रतीकात्मक जेल की सजा और 20,000 रुपये का जुर्माना सुनाया था।

  14. वे 21 सितंबर 1997 को दूसरी बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने और यह कार्यकाल 12 नवंबर 1999 तक चला।

  15. इसी दूसरे कार्यकाल के दौरान 21 से 23 फरवरी 1998 तक उन्हें कुछ दिनों के लिए निलंबित भी होना पड़ा था।

  16. 1999 में पार्टी नेतृत्व से मतभेदों के चलते भाजपा ने उन्हें हटा दिया, जिसके बाद उन्होंने पार्टी छोड़ दी और अपना अलग राजनीतिक दल बना लिया।

  17. वे 2004 में एक बार फिर भाजपा में शामिल हुए और बुलंदशहर लोकसभा सीट से सांसद चुने गए।

  18. 2009 में उन्होंने दोबारा भाजपा छोड़ी और स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में एटा लोकसभा सीट से चुनाव जीता।

  19. वर्ष 2013-14 में वे तीसरी बार भाजपा में वापस लौटे।

  20. 4 सितंबर 2014 को उन्हें राजस्थान का राज्यपाल नियुक्त किया गया, जिस पद पर वे 8 सितंबर 2019 तक रहे।

  21. इसी दौरान 28 जनवरी 2015 से 12 अगस्त 2015 तक उन्होंने हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल का अतिरिक्त प्रभार भी संभाला।

  22. वे राजस्थान के अकेले ऐसे राज्यपाल थे जिन्होंने किसी अन्य राज्य के राज्यपाल का अतिरिक्त प्रभार भी संभाला।

  23. कल्याण सिंह को भाजपा के अत्यंत पिछड़ा वर्ग (OBC) का प्रमुख चेहरा माना जाता था।

  24. 1990 के दशक की राजनीति में जब देश "कमंडल" (हिंदुत्व) और "मंडल" (आरक्षण) राजनीति के बीच बंटा था तब वे दोनों ही धाराओं में समान रूप से प्रभावशाली नेता माने जाते थे।

  25. उन्हें राम मंदिर आंदोलन के प्रमुख सूत्रधारों में से एक माना जाता है और उनकी लोकप्रियता का बड़ा आधार यही आंदोलन रहा। मुख्यमंत्री रहते हुए भी उन्होंने कार सेवकों पर गोली न चलाने का विवादास्पद निर्णय लिया था जिसकी कीमत उन्हें अपनी सरकार गंवाकर चुकानी पड़ी।

  26. बाबरी विध्वंस के बाद नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए उन्होंने तुरंत मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था जिसके चलते हिंदुत्व समर्थकों के बीच उनकी छवि और मजबूत हुई।

  27. 5 अगस्त 2020 को अयोध्या में जब राम मंदिर का भूमि पूजन हुआ तो उन्होंने इसे अपने जीवन के सबसे बड़े सपनों में से एक का साकार होना बताया था। 

  28. भाजपा और उनके करोड़ों समर्थक उन्हें आदर और स्नेहवश "बाबूजी" कहकर पुकारते थे और आज भी पार्टी के वरिष्ठ नेता उन्हें इसी नाम से याद करते हैं।

  29. मुख्यमंत्री रहते हुए साफ-सुथरे प्रशासन और अपराध नियंत्रण के लिए भी उनकी प्रशंसा की जाती रही।

  30. 4 जुलाई 2021 को संक्रमण के कारण उन्हें लखनऊ के संजय गांधी पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (SGPGI) के ICU  में भर्ती कराया गया और 21 अगस्त 2021 को सेप्सिस व मल्टी-ऑर्गन फेलियर के कारण 89 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। उनके निधन पर उत्तर प्रदेश सरकार ने तीन दिन के राजकीय शोक की घोषणा की और बुलंदशहर के नरोरा में गंगा तट पर पूरे राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया।


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