नमस्कार दोस्तों आज के इस आर्टिकल में हम ध्यान गुरु व एक आध्यात्मिक उपन्यासकार गुरुदेव ईशान महेश जी के बारे में जानेंगे। उन्होंने अपने ज्ञान के बल पर लोगों को एक नई राह दिखाई है।
व्यक्तिगत जीवन
श्री ईशान महेश जी का जन्म 11 अप्रैल 1968 को नई दिल्ली में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनका मूल नाम महेश दत्त शर्मा है पर संन्यास लेने के बाद उनका नाम ईशान महेश है। और लोग अब उन्हें इसी नाम से जानते हैं।
उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी विषय में M.A किया है।
1990 के दशक से उन्होंने लघु कविताएं तथा कहानियां लिखना शुरू कर दिया था तथा बाद में उन्होंने नाट्य तथा उपन्यास भी लिखना शुरु कर दिया।
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प्रकृति के प्रति उनकी गहरी संवेदनशीलता तथा मानवीय भावनाओं के प्रति अंतर्दृष्टि ने उन्हें चेतना की वास्तविकता का पता लगाने के लिए प्रेरित किया।
उनकी आध्यात्म के प्रति गहरी आस्था के चलते उन्हें कई सिद्ध सन्यासियों का संग तथा उनकी सेवा करने का मौका प्राप्त हुआ है। और उन्हें कई सन्यासियों का आशीर्वाद भी प्राप्त हुआ है । वे खुद भी एक सन्यासी रहे हैं। श्री ईशान महेश जी बताते हैं कि उन्हें हनुमान जी का साक्षात्कार हुआ है तथा हनुमान जी ने ही उनके जीवन की दिशा को बदल दिया।
हनुमान जी का साक्षात्कार
महेश जी बताते हैं कि वे जब पहली बार हिमालय गए थे तो वे गंगा नदी के किनारे बैठकर हनुमान चालीसा पढ़ रहे थे तभी वहां उनकी मुलाकात एक यायावर सन्यासी से होती है। और वह सन्यासी उन्हे देख कर हंसने लगता है तथा कहता है कि चालीसा रटने से हनुमान जी कभी प्राप्त नहीं होंगे। तब वे उस सन्यासी को अपना गुरु बना लेते हैं।
वह सन्यासी महेश जी को यह कार्य बताता है कि तुम्हें 3 दिन तक गंगा नदी के किनारे बैठे रहना है और ना हनुमान जी का ध्यान करना है और ना राम जी का। तब महेश जी उस सन्यासी से प्रश्न करते हैं कि तो मैं 3 दिन तक यहां करूंगा क्या?
तब वह सन्यासी उन्हें कहता है कि इसी चीज को तो समझना है कि क्या इंसान बिना कार्य किए नहीं रह सकता है जरूरी ही है कि कुछ ना कुछ कार्य किया ही जाए।
और वे उस सन्यासी की बात को मान कर 3 दिन तक गंगा नदी के किनारे बिना कुछ किए हुए बैठे रहते हैं और 3 दिन पूरे हो जाने के बाद वह सन्यासी उनके पास आता है और महेश जी को अपनी आंखें बंद करने के लिए कहता है इसके बाद जैसे ही वह सन्यासी उन्हें छूता है वे गहरी ध्यान निंद्रा में पहुंच जाते हैं तब उन्हें हनुमान जी का साक्षात्कार होता है । कुछ समय पश्चात जब वे अपनी आंखें खोलते हैं तो वह सन्यासी अदृश्य हो चुका था तथा उसके बाद वह उन्हें कभी नहीं मिला।
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आध्यात्मिक उपन्यास की प्रेरणा
पहली बार हनुमान जी का साक्षात्कार हो जाने के बाद उनका हिमालय में आना जाना लगा रहता था। एक दिन फिर वहां पर उनकी मुलाकात एक और सन्यासी से होती है जो उनके पास आकर कहता है कि हनुमान जी का उनके लिए आदेश है कि आप राम जी के चरित्र पर उपन्यास लिखें जबकि उससे पहले भी छोटी कविताएं व कहानियां लिखा करते थे।
तब वह सन्यासी से कहते हैं कि मुझ में इतना सामर्थ नहीं है कि मैं राम जी के चरित्र पर उपन्यास लिख सकूं। वह सन्यासी कहता है कि सामर्थ हो भी नहीं सकता है पर हनुमान जी ने कहा है कि वे खुद आपको यह लिखवाएंगे। क्योंकि वह पहले भी तुम्हें मिल चुके हैं।
तब से हनुमान जी उनसे आध्यात्मिक उपन्यास लिखवा रहे हैं। वे ईशान ध्यान केंद्र के संस्थापक भी हैं
उनकी रचनाएं
उनके द्वारा कई आध्यात्मिक उपन्यास लिखे जा चुके हैं जिनमें से कुछ इस प्रकार है-
चित्रकूट के घाट पर,वनवास, वन वन में राम, सीता हरण, रामबाण, कृष्ण एक रहस्य, अनहोनी, विराज, भारत एक खोज, इत्यादि।
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| Eeshaan Mahesh biography in Hindi |
यदि आप उनसे संपर्क करना चाहते हैं तो आप इस प्रकार कर सकते हैं
Email:- eeshaandhyanmandir@gmail.com
WhatsApp :- +91 85878 91910
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