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(थांग-टा)Thang-Ta kya hai | what is Thang Ta in Hindi

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    नमस्कार दोस्तों आज के इस आर्टिकल में हम(थांग-टा) Thang-Ta kya hai  इसके बारे में जानेंगे। और इस कला से जुड़े आपके सभी प्रश्नों का उत्तर देने का प्रयास करेंगे तो आर्टिकल को अंत तक पढ़ते रहिएगा-

    Thang-Ta क्या है


    Thang -Ta भारत के मणिपुर राज्य की एक प्राचीन मार्शल आर्ट तकनीक है। मार्शल आर्ट युद्ध की एक ऐसी कला है जिसका प्रयोग खुद की शारीरिक तौर पर रक्षा या किसी अन्य की रक्षा करने के लिए किया जाता है। Thang -Ta मणिपुर में बेहद प्रचलित है। इस कला में शस्त्रों का प्रयोग किया जाता है।

    थांग -टा

    यह दो शब्दों से मिलकर बना हुआ है थांग तथा दूसरा शब्द टा है।
    थांग का शाब्दिक अर्थ है- तलवार तथा टा का अर्थ है- भाला। इस प्रकार थांग टा एक ऐसी युद्ध कला है जिसमें तलवार व भाले का प्रयोग किया जाता है। इस कला को भी अन्य युद्ध कलाओं के जैसे ही शारीरिक बल व बुद्धि का उचित संतुलन बैठाकर सीखा जाता है। मणिपुर लोक मान्यता के अनुसार इस कला में प्रयोग होने वाले तलवार को माता तथा भाले को पिता के समान माना जाता है। इसके पीछे तर्क यह है कि जिस प्रकार माता-पिता अपने बच्चे की सुरक्षा करते हैं उसी प्रकार युद्ध में सैनिक तलवार व भाले की सुरक्षा में रहता है। यह एक आत्म सुरक्षा की तकनीक है तथा इसका प्रयोग खुद की जानवरों से या कि फिर दुश्मन से रक्षा करने के लिए किया जाता है।आइए अब समझते हैं इस कला के पीछे का इतिहास क्या है-

    थांग-टा  मार्शल आर्ट क्या है ?
    Thang ta kya hai



    Thang -Ta का इतिहास


    इतिहासकारों के मुताबिक ऐसा माना जाता है कि इस कला का जन्म भारत के मणिपुर राज्य में कंगलीपैक नामक स्थान पर 19वीं शताब्दी के अंत में हुआ था। तथा इस कला की शुरुआत मितई रेस नामक प्रजाति से हुआ है। कई युद्ध कला के गुरुओं का मानना है कि इस कला का इतिहास कई हजार वर्ष पुराना है और इस कला की शुरुआत सर्वप्रथम उत्तर पूर्वी भारत में ही हुई थी। प्राचीन समय में राजा- महाराजाओं तथा कबीलों के बीच अपने वर्चस्व के लिए युद्ध हुआ करते थे। इसी संघर्षपूर्ण जीवन के कारण इस कला का जन्म हुआ। प्राचीन समय में यह कला राजा और सैनिक सीखा करते थे ताकि वे अपनी जनता की रक्षा कर सकें। पर बदलते समय के साथ इसका कला ने लोक नृत्य का भी रूप ले लिया। इस कला को सीखने के लिए चीनी लोगों का भारत आने का उल्लेख इतिहास में भी मिलता है।

    Thang -Ta कैसे सिखा जाता है


    इस कला को तीन प्रकार से सिखाया जाता है

    1-युद्ध की तैयारी के लिए
    यह दो प्रकार की होती है एक प्रकार की आत्म सुरक्षा के लिए थांग-टा तथा आक्रमण के लिए थांग-टा।

    2-नृत्य के लिए
    इस कला में ढोलक कदमों की आवाज व तलवार की आवाज सुनाई देती है।

    3-त्योहारों के लिए

    इस कला को सीखने के लिए सबसे पहले सीखने वाला अपने गुरु को प्रणाम करता है उसके बाद आकाश और धरती को प्रणाम करता है और अंत में अपने विपक्षी को भी प्रणाम करता है।
    शुरुआत में अभ्यासकर्ता एक लंबी डंडे की सहायता से अभ्यास करवाया जाता है ताकि उसकी भुजाएं व संतुलन अच्छा हो सके वह अंग्रेजी के नंबर 8 की तरह इसे घुमाता है ताकि किसी भी दिशा से होने वाले आक्रमण से वह बच सकें।
    इस कला को सीखने के लिए गुरु व शिष्य की वेशभूषा भी अलग-अलग होती है गुरु लाल रंग के कपड़े पहनता है जिसे साफी लंपी कहा जाता है। तथा शिष्य काले रंग के कपड़े जिसे सामी लामी कहा जाता है पहनता है। सिर पर एक पगड़ी रहती है जो कि कानों तक ढकी  रहती है ताकि बाहर से आने वाली आवाज ध्यान न भटक जाए।

    हृाूएन लैंगलान तथा थांगटा में क्या अंतर है


    हृाूएन लैंगलान(huyen lallong) भारत के मणिपुर का ही एक मार्शल आर्ट है  हृाूएन का शाब्दिक अर्थ है -युद्ध, जबकि लैंगलान का -जाल। इस कला के दो प्रमुख घटक है पहला स्थान थांग-टा  तथा दूसरा सरित सरक। हृाूएन लैंगलान तथा थांगटा की युद्ध शैली लगभग एक जैसी है पर हृाूएन लैंगलान में तलवार  भाले के अतिरिक्त ढाल व कुल्हाड़ी का भी इस्तेमाल किया जाता है।

    Thang -Ta विलुप्त कैसे हुई


    जब भारत अंग्रेजों के अधीन था तब 17वीं शताब्दी में मणिपुर के कई राजाओं ने इस कला का प्रयोग अंग्रेजो के खिलाफ किया और इस कला को खुद के खिलाफ खतरा पाकर अंग्रेजो ने इस पर प्रतिबंध लगा दिया। पर इस कला के गुरुओं ने‌ व जानने वालों ने इस कला को छिपकर सिखाना शुरू किया और इस प्रकार इस कला को मणिपुर में पूरी तरीके से लुप्त नहीं होने दिया।

    इस कला का फिर से उदय

    भारत देश के ब्रिटिश साम्राज्य से आजाद हो जाने के बाद इस कला का प्रचार प्रसार‌ फिर से किया गया। इसमें एक महत्वपूर्ण नाम मायामवर किशोर शर्मा का आता है जिन्होंने इस कला को आम जन तक पहुंचाने के लिए अपना जीवन समर्पित किया। उन्होंने इस कला के प्रति आम लोगों को जागरूक किया और अपने कई सेमिनार भी आयोजित किये।
    वर्ष 1972 में मणिपुर स्टेट कला अकैडमी का गठन हो जाने के बाद उन्होंने राज्य की सरकार से थांग-टा के लिए पुरस्कार दिए जाने की सिफारिश की। धीरे-धीरे यह कला एक बार फिर से आम लोगों के बीच लोकप्रिय होना शुरू हुई। मायामवर किशोर शर्मा कि इस कला के प्रति योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें 2009 में पद्मश्री से सम्मानित किया।

    आज थांग-टा देश में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी अपनी पहचान बना रहा है। और कई लोग इसे अपने कैरियर के तौर पर भी चुन रहे हैं।

    आज के इस आर्टिकल में बस इतना ही हमें अपना समय देने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद
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